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सर्दी या परिस्थीती - कविता )

हमारा जीवन हमें प्रतेक परिस्थिती में ढलना शिखा र उनके बारे मेंोचिये जो परिस्थिती में ढलना चाहे तो भी वो उसमे ढलने में सक्षम नहीं हो पाते उनकी परिस्थीती उन्हें उसमे ढलने नहीं देती ,
में उन् गरीब बच्चो के बारे में बात कर रही हूँ जो अक्सर मंदिर चौराहे पर हमें हाथ फैलाये दिख जाते है ,
लोग जब अपनी कारो में पूरी तरह से स्वेटर ,पफलर ,दास्तानों  से ढके रहते है तब ये अपने कपकपाते हाथो से हमसे कुछ पैसे मांगते है कितना अजीब लगता है , है ना 
मेरी ये कविता उन्ही पर आधारित  है ,
सर्दी आई सर्दी आई 
ठंडी- ठंडी सर्दी आई 
टोपी मफलर शाल निकालो  
लोग सभी जल्दी घर में भागो  
कड़कड़ाती कपकपाती  
सर्दी आई सर्दी आई .....
किसी- किसी को भाती सर्दी 
किसी - किसी को नहीं लुभाती  
स्वेटर मफ़लर टोपी दास्ताने ,
है सभी कुछ ,
उनको ही अक्सर ये 
सर्दी भाई सर्दी भाई .....
जिनके पास स्वेटर तो छोड़ो 
रहने  को ही घर नहीं है ,
आप ही बताओ भईया कहाँ से उसको 
ये सर्दी भाई  सर्दी भाई ......

हमें उन बच्चो के लिए कुछ तो करना चाहिए ताकि वो भी कड़कड़ाती  ठण्ड  में बच सके  उन  सभी से मेरी विनती है जो चोराहो  पर और मंदिरो में इस तरह के बच्चो को देखते है और जो इनकी  मदत करने में पूरी तरह से सक्षम है उन सभी से मेरा निवेदन  है की  बोहोत नहीं तो थोड़ी ही सही इनकी मदत करने के लिए आगे आये ..
छमा चाहूंगी अगर कोई भी बाते आप को बुरी  लगी हो तो कृपा  आप अपनी प्रतिक्रिया देना ना भूले ...
धन्यवाद

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